तीर्थंकर और केवलीमें क्या अंतर है ?

तीर्थंकर और केवलीमें क्या अंतर है ? - Chandani Sameer Vora, Mumbai (Mandvi)

१. तीर्थंकरके तीर्थंकर नामकर्मका उदय होता है, सामान्य केवलीके नहीं।

२. तीर्थंकर पूर्वजन्ममें दो भवसे निश्चित सम्यकदृष्टि होते हैं, केवलीके ऐसा नियम नहीं है।

३. तीर्थंकर गर्भमें अवधिज्ञानी होते हैं, केवलीके लिए नियम नहीं।

४. तीर्थंकरकी माता १४ स्वप्न देखती है, केवलीकी माताके लिए जरूरी नहीं।

५. तीर्थंकर पुरूष होते हैं (तीर्थंकर मल्लिका स्त्री होना आश्चर्य माना गया), केवली स्त्री, पुरुष और कृत नपुंसक सभी हो सकते हैं।

६. तीर्थंकर स्तनपान नहीं करते, जबकि केवली करते हैं।

७. तीर्थंकर दीक्षासे पूर्व नियमित वर्षीदान देते हैं, केवली दे सकते हैं, पर ऐसा नियम नहीं है।

८. तीर्थंकर केवलज्ञानकी प्राप्तिसे पहले प्रवचन नही करते, प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। सामान्य केवली छद्मस्थ अवस्थामें भी उपदेश देते हैं।

९. तीर्थंकरके ५ कल्याणक होते हैं, केवलीके नहीं।

१०. तीर्थंकरको दीक्षा लेते ही मनःपर्यव् ज्ञान हो जाता है, केवली को नहीं।

११. तीर्थंकर स्वयं बुद्ध होते हैं, केवलीके लिए यह नियम नहीं।

१२. तीर्थंकरको दीक्षाके पूर्व लोकांतिक देव उदबोधन देते हैं (देवोंका जीताचार है), सामान्य केवलीके लिए देव नहीं आते।

१३. तीर्थंकर चतुर्विध तीर्थकी स्थापना करते हैं, केवली नहीं।

१४. तीर्थंकरका शासन चलता है, सामान्य केवलीका नहीं।

१५ तीर्थंकर के मुख्य शिष्य गणधर होते हैं, केवलीके शिष्य गणधर नहीं होते।

१६. तीर्थंकरके आठ प्रतिहार्य होते हैं, केवलीके नहीं।

१७ तीर्थंकरके ३४ अतिशय होते हैं, केवलीके नहीं।

१८. तीर्थंकरकी वाणीके ३५ विशिष्ट गुण होते हैं, केवली के नहीं।

१९ तीर्थंकर भवमें १,२,३,५ और ११ वां गुणस्थान स्पर्श नहीं करते, जबकि केवली ११ वां छोड़ सभी गुणस्थानका स्पर्श कर सकते हैं।

२०. तीर्थंकरके केवली- समुद्घात नहीं होता, जबकि केवलीके होता है।

२१. तीर्थंकरका जन्म क्षत्रियकुलमें ही होता है, केवली सभी कुलोंसे हो सकते हैं।

२२. तीर्थंकरके समचतुरस्र संस्थान ही होता है, केवलीके छमेंसे कोई भी हो सकता है।

२३. तीर्थंकरका आयुष्य जघन्य ७२ वर्ष उत्कृष्ट ८४ लाख पूर्वका होता है। सामान्य केवलीका आयुष्य जघन्य ९ वर्ष उत्कृष्ट कऱोड़ पूर्वका होता है।

२४. तीर्थंकरकी अवगाहना जघन्य ७ हाथ उत्कृष्ट ५०० धनुष की हो सकती है, सामान्य केवलीकी अवगाहना जघन्य दो हाथ उत्कृष्ट पाञ्च सौ धनुषकी होती है।

२५. तीर्थंकर मात्र १५ कर्मभूमिमें ही होते हैं, केवली संहरणकी अपेक्षा सम्पूर्ण अढ़ाई द्वीपमें हो सकते हैं।

२६. तीर्थंकर स्वयं ही दीक्षा लेते हैं, गुरुसे नहीं, केवली स्वयं या गुरुसे भी दीक्षा ले सकते हैं।

२७. तीर्थंकर एक क्षेत्रमें एक ही होते हैं, केवली अनेक हो सकते हैं।

२८. दो तीर्थंकर आपसमें मिलते नहीं, केवली मिलते हैं।

२९. तीर्थंकर जघन्य २० उत्कृष्ट १७० होते हैं।केवली जघन्य २ करोड़, उत्कृष्ट ९ करोड़ होते हैं।

३०. तीर्थंकरके अर्थरुपी उपदेशसे गणधर द्वादशांगीकी रचना करते हैं, केवलीके ऐसा नहीं होता।

३१. तीर्थंकरके केवलज्ञान प्राप्तिके बाद उपसर्ग आते नहीं, केवलीके उपसर्ग आ सकते हैं। (वीर प्रभुको गौशालाका उपसर्ग अच्छेरा)

३२. समवसरणकी रचना तीर्थंकरके लिए होती है, केवलीके लिए नहीं।

३३. तीर्थंकरका प्रथम उपदेश ख़ाली नहीं जाता, केवलीके ऐसा नियम नहीं। (वीर प्रभु की पहली देशना खाली जाना अच्छेरा)

३४. नरक या देवगतिसे आये हुए मनुष्य ही तीर्थंकर बनते हैं, जबकि केवली चारों गतिसे आकर जन्में हुए बन सकते हैं।

३५. तीर्थंकरके वेदनीयकर्म शुभाशुभ, शेष तीन अघाति कर्म एकान्त शुभ, केवलीके आयुष्यकर्म शुभ, शेष तीन शुभाशुभ होते हैं।

३६. अभवि, तीर्थंकरकी सभामें नहीं आता, केवलीकी सभामें आ सकता है।

KUTCH GURJARI

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