दिव्या

दिव्या - ज्योतिका अशोक महेता, कलिकट

ये एक सच्ची घटना है, नाम बदल दिए है, आज दुनिया इकीसवीं सदी में पहुंच चुकी है और  सास पुराण अब भी वोही ! ! !  

माता पिता की पहेली संतान कन्या रत्न \ धर्म - संस्कार के रंग में  रंग कर कोम्प्युटर इंजीनियर बन गई दिव्या \ कंपनी के उच्च पद  पर कार्यरत विनय के घर से रिश्ते की बात आयी, दोनों परिवार  मिले, बात हुई, सोच मिली, मन मिला, एक दूसरे को पसंद आये, सगाई हो गइ, शादी की शहनाई बजी, ससुराल में नई बहु का स्वागत हुआ, परिवारमें ख़ुशी के साथ रोनक छा गई \ लेकिन विधाता ने कुछ और ही सोचा था  दिव्या के भाग्य में इस बात से अनजान दिव्या रंगीन सपनो की दुनिया में  खोने ही लगी थी की  . . . 

शादी के दूसरे ही दिन  . . . 

दिव्या को  कमरे में अकेली देख सास कमरे में आयी और बोली '' देखो जबतक मेरी बेटी तान्या शादी करके ससुराल न जाए और माँ न बन जाये तबतक तुम बच्चे के बारे में सोचना भी नहीं  . . . '' 

ये सुनते ही दिव्या बोली '' पर मम्मीजी . . .

कुछ आगे बोलने जाये तभी सास ने गुस्से से कहा '' चुप, बिच में मत टोक, मेरी बात अभी पुरी नहीं हुई, सुन, हमारे परिवार का रिवाज है गॉद भराई  के बाद बहु को मायके नहीं भेजते, ससुराल में ही जचकी होती है, अगर तू अभी माँ बनी तो सारा काम मुझे और मेरी बेटी को करना पड़ेगा जो मैं नहीं चाहती, तान्या की पढ़ाई में भी बाधा आएगी 

हां एक बात और ये बात तेरे मेरे बिच में ही रहनी चाहिए, इसी में ही तेरी भलाई है, तेरे लाख कहने पर भी मेरा बेटा तेरी ये बात नहीं मानेगा, वो मेरा बेटा है, मुज पर ही भरोषा करेगा, इस घर में सिर्फ और सिर्फ मेरा राज चलता है, जितना कहु उतना ही होता है, मुझे तेरी कोई बात नहीं सुननी समज गई ? '' इतना बोल कर  सास कमरे से निकल गई 

सोच में पड गई दिव्या, क्या करू ? किसे कहु ?कौन मेरी बात का यकीन करेगा ? वो भी सादी के दूसरे ही दिन ? बहुत सोचने पर लगा की इस राज को समय पर ही खुलने का इंतजार करना होगा मुझे 

नया नया नौ दिन  . . . हसी ख़ुशी बीते।  . . . सपने सच होने लगे थे की एक दिन सास ने कहा '' बेटा तुम्हारी नौकरी है तो तुम जाओ, बहु हमारे पास रहेगी, तुम शनि रवि आजाना '' 

'' पर माँ दिव्या भी साथ चलती तो मुझे घर का खाना मिलता '' विनय बोला 

'' बेटा, बहु के सभी पहले तीज त्यौहार यहाँ होना चाहिए, रीत - रिवाज - तौर तरीके सीखाने है, हमें भी बहु के साथ रहना है, '' माँ बोली 

'' हां माँ, आपकी बात सही है, आप जैसा ठीक समजे '' विनय बोला 

विनय के जाते ही सास बोली '' देखा बहु मेरी बात ही चली ''

हर शनि - रवि विनय आता, दो दिन बड़े अच्छे होते थे, बेटी की तरह ख़याल रखती थी सास, विनय के जाते ही सास - ननद अपना असली रंग दिखाना शुरू कर देते, ससुर बहुत अच्छे थे मगर घर में उनकी एक नहीं चलती 

दिन बितने लगे  . . . महीने व्यतीत होने लगे  . . . एक साल गुजर गया

माँ के कहने पर विनय ने अपने ऑफिस के पास किराए का छोटा सा घर लिया

दिव्या ने घर को मंदिर बनाया 

खुश थी दिव्या, खुबसुरत जिंदगी मानो दौड़ने लगी, सपने सच होते नज़र आये, लगताथा सब कुछ सम्भल ने लगा है, की  . . . 

एक दिन माँ का फोन आया बोली '' बेटा घर सजा लिया होगा, हमे बहु के बिना अच्छा नहीं लगता तुम बहु को लेकर हर शनि - रवि हमसे मिलने आया करो '' 

'' ठीक है माँ जैसा आप कहे '' विनय बोला 

 '' बेटा जरा दिव्या से बात करनी है '' माँ बोली 

'' जी मम्मीजी पाय लागु, आप कैसी है ? पापाजी और तान्या बहन कैसी है ? '' दिव्या बोली 

'' सब ठीक है, क्या सोचा था शनि - रवि की छूट्टी में तुजे वहा गुमने - फिरने - मौज मस्ती की आज़ादी मिली ? हरगिज़ नहीं, मैंने हप्ते में दो दिन यहाँ आने का इंतेज़ाम कर दीया है '' सास ने कहा और फोन काट दिया 

इतने दिनों मे दिव्या ने एक बात जान ली थी की विनय अपनी माँ से इतना प्यार करता है की माँ की कोई बात टाल नहीं शकता और मेरे साथ जो हुआ उसका यकीन भी नहीं करेगा, सच्चाई सामने लाने  के लिए मुझे और थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा, एक दिन सुबह में दिव्या को उल्टियां होने लगी, चकर आने लगे तो गए डॉक्टर के पास \ 

'' विनय बहुत बहुत बधाई हो तुम बाप बन ने वाले हो प  . . . र . . . दिव्या को आराम करना पडेगा, एक महीने तक बिस्तर से उठना नहीं है , '' डॉक्टर बोले 

'' जी, डॉक्टर मैं दिव्या का पूरा खयाल  रखुगा, आप चिंता ना करे, मैं उसे मेरी मम्मी के पास छोड़ आउगा, '' विनय ख़ुशी ख़ुशी बोला 

'' नहीं बेटे ये मत करना क्युकी दिव्या सफर करने की स्थिति में नहीं है, तू मम्मी को ही यहाँ बुला ले '' डॉक्टर ने कहा 

'' ठीक है डोक्टर मैं मम्मी को यहाँ बुला लूंगा '' विनय बोला 

दोनों ख़ुशी ख़ुशी घर आये, माँ को फोन किया और दिव्या के होंश उड़ गए 

'' माँ आप दादी बन ने वाली है '' विनय बोला 

'' वाह बेटा तूने तो बहुत ही अच्छी खबर सुनाई, बहु को लेकर यहाँ आजा, वहा कौन ख्याल रखेगा ? तू ऑफिस चला जाएगा '' माँ बोली 

'' नहीं माँ, डॉक्टर ने दिव्या को सफर करने से मना किया है, तू यहाँ आजा '' विनय बोला 

'' बेटा तान्या का इम्तेहान है मेरा आना नामुमकिन है, कुछ नहीं होगा दिव्या को तू सम्हाल के लाना, हम सब है यहाँ उसका अच्छे से ख्याल रखेंगे '' माँ बोली 

'' ठीक है माँ आप जैसा कहे '' विनय बोला 

ये बात सुनते ही गभरा गई दिव्या, डर ने लगी क्या होगा ? पति को बता नहीं शकती ससुराल जाना नहीं चाहती, अपनी मम्मी से बात की 

'' बेटा, मैं आ रही हु, बाद में सोचेंगे,'' मम्मी बोली 

मम्मी के आते ही दिव्या को शांति मिली, पूरी बात माँ को बताई, दोनों ने सच्चाई सामने आने का इंतज़ार करना ही ठीक समजा

'' बेटा देख तेरी सास की जिद है तो तू जा, मै भी वहा हु, जब तेरा जी गभराय या कुछ भी ऐसा लगे तो मुझे फोन करना मै आ जाऊगी, तू चिंता मत कर, सब ठीक हो जायेगा  '' माँ ने दिलासा दिया 

दिव्या ससुराल आ गयी, ससुरजी की ख़ुशी समा नहीं रही थी दादा जो बनाने वाले थे, दो दिन हसी ख़ुशी बीते, दिव्या का डर कम होने लगा ही था की एक दिन सुबह में, विनय दवाई लेने बहार गया, दिव्या सो रही थी, ससुरजी दूकान गए, मौका देख सास कमरे में आयी, विनय वॉलेट घर पे भूल गया था और वो घर आया इस बात से अनजान सास नेदरवाजे पे खड़ी होके आवाज़ दी  . . 

 '' दिव्या '' ... गुस्से से भरी माँ की आवाज सुन विनय हैरान हो गया सोचा ये माजरा क्या है ? कमरे के बहार खड़ा सुनने लगा की माँ बोली '' मैंने ने मना किया था, तू अभी बच्चे के बारे में सोचना नहीं, पर तू मेरी बात नहीं मानी, देख तेरा क्या हाल करती हु, ले ये पपीता खा , ''

'' नहीं माँ इन दिनों में पपीता नहीं खाना चाहिए, मैं नहीं खाऊंगी आप मुझे ये नहीं खिला शकती '' दिव्या ने कहा 

'' तुजे खाना ही पडेगा, भूल गई मैंने क्या कहा था ? '' ले सारी बाते फिर से याद दिलाती हु ये कहकर सब बाते बतादी और दिव्या की ओर बढ़ने लगी ही थी की तभी दिव्या ने अपनी मम्मी को मीस कॉल दे दिया, इस बात से अनजान सास पपीता दिव्या को खिलाने वाली ही थी की दिव्या पलंग से उठ कर भाग ने की कोशिश में गिर रही थी की विनय की आवाज़ ने माँ को चौका, विनय दौडा दिव्या को पकड़ने जब तक दिव्या गिर कर बेहोश हो गयी तभी मम्मी अंदर आयी ये नज़ारा देख हैरान रह गई 

विनय ने पत्नी को उठाया और गया डॉक्टर के पास 

डॉक्टर ने कहा '' बेटे माफ़ करना हम बच्चे को नहीं बचा पाए ''

ये सुन कर विनय हैरान रहे गया 

'' माँ , ये तू ने क्या किया ? क्युँ किया ? मैं सोच भी नहीं शकता तू मेरे बच्चे के साथ ये घिनोनी हरकत कर शकती है ! ! ! '' विनय ने कहा 

'' बेटा  मैं  . . . मैं  . . . मैं '' माँ आगे कुछ नहीं बोल पाई, ना ही सच्चाई को बहार आने से रोक पाई 

अपना बच्चा नहीं रहा ये जानते ही दिव्या फीर बेहोश हो गयी, बड़ी मुश्कील से संभाला खुद को

दिन बितते गए, विनय अपनी माँ को माफ़ नहीं कर पा रहा था, तान्या की शादी तय हो गई, दिव्या ने सब कुछ भुला के बड़ी धूम धाम से ननद की शादी की, सास ससुर की वाह वाह हो गई, सास और ननद की आंखे खुल गयी, अपनी गलती का अहेसास हुआ , 

दिन बीतते गए  .... दिव्या को पार्ट टाइम जॉब मिल गया, हसी ख़ुशी जिंदगी गुजरने लगी, हर शनि रवि विनय को ले कर ससुराल आती थी दिव्या, ताकि विनय अपनी माता को माफ़ कर शके, सास प्रायश्चित कर शके, परिवार पहले जैसा खुश हाल बन जाय 

दिव्या को माँ बनने का अवसर मिला, विनय की ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था, सास को पता चला तो दौड़ के आ गयी दिव्या के पास, देखभाल के लिए रुकने ही वाली थी की  . . . 

'' माँ , पिताजी वहां  अकेले है आप वहां रुको, दिव्या को मैं उसकी माँ के पास छोड़ देता हु  '' विनय बोला 

'' बेटा क्या तू मुझे माफ़ नहीं करेगा ? '' माँ ने पूछा 

'' सुनिए माँ को माफ़ करदो, माँ को अपनी गलती का अहसास हो गया, पछतावा भी है, हमारी माँ है, होनी को कोई नहीं टाल शकता '' दिव्या ने समझाया 

'' हां, तुम्हारी बात सही है, ठीक है मैं माँ को माफ़ करता हु, पर तू तेरी माँ के घर रहेगी ये बात तय है '' विनय बोला 

दिन बितते रहे  . . . सब कुछ ठीक होता हुआ लग रहा था, इस हादसे के बाद सास - बहु में से माँ -बेटी के रिश्ते ने जन्म ले लिया  . . . धूमधाम से सास ने दिव्या की गोदभराई की  . . .

मानो सारी दुनिया की खुशियां विनय के परिवार पर बरस रही हो  . . .

आने वाले लम्हो के सुहाने सपनो में सभी खो रहे थे की  . . . 

अचानक तान्या का अकस्मात हो गया , पेट में अंदरूनी चोट की वजह से वो माँ बन ने की क्षमता  खो चुकी, खुशियों के पल पर मातम छा गया था की पता चला की दिव्या के पेट में जुड़वा बच्चे है, बस दिव्या ने कुछ सोच के पति - सास - ससुर - माता - पिता को बिनती की '' दो बच्चे मेंसे एक बच्चा तान्या को देना चाहती हु ''

ये बात सुन कर सभी चौंक गए, तभी दिव्या ने समझाया '' हम दोनों को बेटी ही चाहिए, दुसरा बेटा या बेटी जो भी होगा तान्या को देंगे ताकि उसकी गोद भर जाए और ससुराल से बांज होने का ताना भी नहीं सुनना पडेगा ''

'' बात तेरी सही है, मुझे मंजूर है ''

विनय खुश हो कर बोला 

'' पर बेटा, अगर बेटी और बेटा हुआ, तुम बेटा दे दोगे तो हमारे वंश का क्या ? '' माँ चिंतित हो के बोली 

'' माँ, बेटी भी वारिश है और तान्या के परिवार में यह सोच नहीं है, उसका दर्द दूर करना ही हमारा धर्म है, तकदीर में जो होगा हम अपना लेंगे '' विनय ने समझाया 

'' ठीक है बेटा, तेरी बात भी सही है '' माँ ने कहा 

'' मम्मीजी, बेटा और बेटी में  हमे कोई फर्क नहीं रखना है, ये बात हम तान्या के परिवार को भी समजाना चाहते है मुझे तो दूसरा अवसर मिलेगा, तान्या को यह ख़ुशी हम अभी देना चाहते है '' विनय ने बड़े प्यार से समझाया 

इस फैसले से खोई हुई खुशिया वापस आगयी , 

KUTCH GURJARI

T : + 91 9322 880 555
E : kutchgurjari@gmail.com

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